बारिश में खड़ा हूं मैं ,
बूंदें जरा सह रहा हूं ।
ठहरो जरा रुको तो ,
समझो यूं हालात को ।
ये बेरहम बूंदें पीछे हैं ,
मेरे अपने मेरे आगे हैं ।
अपनो को बचाने को ,
इस बौछार को भी सह लेंगे ।
हम तो दूजो के लिए डूब जाएं ,
ये तो मेरे अपने हैं साहब ।
कागज के रिश्ते थोड़ी ना हैं,
जो पानी में गल जायेंगे साहब ।
अब गीले हुए हैं , तो थोड़ा रो भी लेंगे साहब
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